ZEE5 Yaara Movie Review By Tigmanshu Dhulia Vidyut Jammval Amit Sadh Vijay Kenny Shruti | Yaara Review: दोस्तों की चौकड़ी बनी खतरनाक गैंग, तिग्मांशु ने फिर जमाया यारों का रंग

नई दिल्ली: बॉलीवुड में दोस्ती की कहानियां हमेशा से सुपरहिट रही हैं. चाहे वह ब्लैक एंड वाइट के दौर की ‘दोस्ती’ हो या फिर 70 के दशक की ‘शोले’ के ‘जय-वीरू’ दोस्तों का प्यार और विश्वास, 2000 के समय में ‘दिल चाहता है’ या ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ हमेशा ही दर्शकों के सीधे दिल में जगह बनाता है. एक ऐसी दोस्ती के रंग में सराबोर कहानी लेकर आए हैं तिग्मांशु धूलिया अपनी फिल्म ‘यारा (Yaara)’ के साथ. जिसमें बचपन से साथ-साथ बड़े हुए चार दोस्त अपनी गरीबी और बेचारगी को हराकर बनाते हैं ‘चौकड़ी गैंग’. ये कहानी आपको एक बार फिर अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले दौर में खींचकर ले जाने वाली है.  

फिल्म का नाम: यारा (Yaara)

रेटिंग: 4/5 स्टार

स्टार कास्ट: विद्युत जामवाल, श्रुति हसन, अमित साध, विजय वर्मा, संजय मिश्रा, केनी बसुमतारी आदि.

निर्देशक: तिग्मांशु धूलिया

ओटीटी: ZEE5

इरफान खान को दी श्रद्धांजलि 
फिल्म ‘यारा’ को तिग्मांशु धूलिया ने अपने जिगरी दोस्त इरफान खान को याद करते हुए शुरू किया है. आपको याद दिला दें कि इरफान खान के निधन के बाद तिग्मांशु धूलिया की यह पहली रिलीज होने वाली फिल्म है. 

दमदार एक्शन के साथ जबदस्त स्क्रीन प्ले
यह फिल्म साल 1950 से लेकर अब तक के भारत की तस्वीर को इस कहानी में उकेरती है, लेकिन इस तस्वीर में जो एक्शन, इमोशन और ड्रामा के साथ जो सबसे गहरा रंग है वह है दोस्ती का रंग. इन चार दोस्तों की मुलाकात से लेकर इनके बुढ़ापे तक को इस कहानी में फ्लैशबैक के साथ बड़े ही रोमांचक तरीके से पिरोया गया है. विद्ययुत जामवाल ने एक बार फिर अपने एक्शन में एक नया फ्लेवर फैंस केे सामने पेेेेश किया है. 

ऐसी है कहानी 
चार दोस्त फागुन (विद्युत जामवाल), मितवा (अमित साध), रिजवान (विजय वर्मा) और बहादुर (केनी बसुमतारी) की दोस्ती की कहानी है यह फिल्म ‘यारा’. कहानी फागुन के मुंडन से शुरू होती है. जिसके पिता के पास एक इंसान एक बच्चे मितवा को लेकर आता है. जिसे उसके पिता ने पाकिस्तान से भेजा है. फागुन के पिता मितवा का भी मुंडन कराते हैं और दोनों बच्चों को भाईयों की तरह पालते हैं. ठाकुर फागुन के लोहार पिता को मार देता है, जिसके बाद ठाकुर के घर पर आग लगाकर दोनों भागते हैं और पहुंचते है रास्ते में मिले चाचा (संजय मिश्रा) के साथ नेपाल बॉर्डर. 

लेकिन ये दो दोस्त जहां मिलकर 11 हो जाते थे वहीं इन्हें चाचा के साथ मिलते हैं दो और दोस्त रिजवान और बहादुर. अब बनती है चारों की ‘चौकड़ी गैंग’ जो स्कूल जाने के बहाने तस्करी करते हैं. बचपन की शरारतें और पुलिस का चकमा देते ये बड़े होते हैं फिर एक दिन पटना का बैंक लूटते हैं. यहां हाथ में पैसे आने पर ये दोस्त मिलकर फागुन के पिता की मौत का बदला लेते हैं. और आजादी से हथियार और शराब का धंधा करना शुरू करते हैं. लेकिन ये गैंग नक्सल गिरोह भी हथियार बेचने लगते हैं. यहीं फागुन की जिंदगी में आती है उसकी सुकन्या (श्रुति हासन). इसके आगे कहानी में कई ट्विस्ट आते हैं. जो जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी. 

म्यूजिक ने भी किया कमाल
तिग्मांशु ने संगीत को लेकर भी इस फिल्म में दर्शकों का दिल जीता है. हर गाना फिल्म की सिचुएशन को और बारीकी से समझने में मदद करता है. इस एलबम तकरीनब हर मूड के गाने हैं. कहानी जहां एक लंबे दौर को दिखाती है वहीं इस कहानी का संगीत भी हर दौर के अनुसार रखा गया है. रेव शेरगिल ने फिल्म में तीन गाने ‘खुदखुशी’, ‘बेपरवाह’ और ‘बिखर गए’ लिखे और गाए हैं. तीनों बेहतरीन गाने हैं.

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